बेताल पच्चीसी – दुसरी कहानी – राजा रूपसेन और उसका अंगरक्षक वीरवर Baital Pacchisi second Story
मित्रो आज हम आपको बेताल पच्चीसी की दुसरी कहानी Baital Pacchisi Second Story बताते है | वर्धमाननगर नाम के एक नगर में रूपसेन नाम का एक दयालु और न्यायप्रिय राजा रहता था | उसके नगर में वीरवर नाम का एक बहादुर इन्सान रहता था | वीरवर पहलवान था लेकिन उसके पास कोई काम नहीं था | एक बार उसकी पत्नी ने जीवन पालन के लिए उसे कुछ काम करने को कहा | उसने राजा रूपसेन का अंगरक्षक बनने का निश्चय किया और वो राजा के पास जाने के लिए निकल गया |
उधर राजा अपने नगरवासियों की समस्याए सुलझा रहे थे तभी द्वारपाल ने राजा जो सुचना दी कि कोई उनसे मिलना चाहता है | राजा ने उसका स्वागत करने और पानी पिलाने को कहा | अब राजा द्वार पर आये और उन्होंने वीरवर से आने का कारण पुछा | वीरवर ने राजा से उनका अंगरक्षक बनने की बात कही और वेतन में रोजाना 9 तोला सोना लेने की बात कही | राजा ये सुनकर चौक गया और उनके दरबारी ने ने वीरवर को इतना भारी वेतन का कारण पूछा |
राजा की बात सुनकर वीरवर ने जवाब दिया कि राजा की जान की कीमत के एवज में ये कीमत कुछ भी नहीं है | वीरवर ने कहा कि रात को उसके होते हुए आप चैन की नींद सो पायेंगे | राजा ने बिना ओर सवाल पूछे उसे अपना अंगरक्षक बना लिया | वीरवर की सेवा से राजा बहुत खुश हुआ और रोज उसे 9 तोला सोना देता था | ये सोना जब वो अपनी पत्नी के पास लेकर गया तो उसकी पत्नी ने पूछा कि इतने सोने का हम क्या कर्नेगे | वीरवर ने इस धन में आधा गरीबो में , एक चोथाई मेहमानों को , एक चौथाई अपने लिए रख लेंगे |
एक रात राजा गहरी नींद में सो रहे थे तभी किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी | राजा जाग गया और उसने वीरवर को उस औरत के पास जाकर रोने का कारण पूछा | राजा भी वीरवर को परखने के लिए उसके पीछे चल पड़ा | वीरवर ने उस औरत से रोने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वो इस नगर की राजलक्ष्मी है और काल के दबाव में ये शहर छोडकर जा रही है जिससे रूपसेन का नगर बर्बाद हो जाएगा | वीरवर ने कहा कि वो कुछ इस नगर को बचाने में कर सकता है |
राजलक्ष्मी ने बताया कि एक मील दूर दक्षिण में एक गुफा है जहा पर कालदेवता भूखा है और अगर वो राजा रूपसेन को खा ले तो इन सब से बचा जा सकता है | वीरवर ने पूछा कि कालदेवता को किसी तरह खुश किया जा सकता है | उसने बताया कि अगर कालदेवता की भूख को राजदरबार को कोई ओर इन्सान मिटा दे तो वीरवर ने कहा कि वो स्वय और उसका परिवार कालदेवता की भूख शांत करेगा | यह कहकर वो गुफा की तरफ निकल पड़ा |
पीछे से राजा सारी बात सुन रहा था और उसने राजलक्ष्मी ने कहा कि वीरवर उसका प्रिय सेवक है और राजा के एवज में वो किसी ओर को बलि नहीं देने देगा | राजलक्ष्मी ने राजा से कहा कि वो ओर दूसरा अंगरक्षक रख लेना | लेकिन वो नहीं माना और वो भी थोड़ी देर में गुफा की तरफ निकल पड़ा |
उधर वीरवर और उसका परिवार गुफा के द्वार पर पहुच गये और कालदेवता को प्रसन्न करने के लिए अपने परिवार को बलिदान कर दिया | राजा को गुफा पहुचने में थोड़ी देर हो गयी लेकिन उसने कालदेवता से कहा कि उनका भोजन राजा था और आप उसकी बलि स्वीकार कर रूपसेन और उसके परिवार को छोड़ देवे |
अब बेताल सवाल पूछता है कि राजा और वीरवर में से किसका बलिदान सबसे बड़ा है ???
अब बेताल ने जवाब दिया कि राजा का बलिदान ज्यादा बड़ा है क्यूंकि सेवक का काम तो राजा की सेवा करना होता है उसमे उसकी जान ही क्यों ना चली जाए | लेकिन वो राजा जो अपने सेवक के लिए अपनी बलि दे सकता हो वो उससे भी बड़ा बलिदान है जिसका साहस करना बड़ा कठिन है इसलिए राजा का बलिदान वीरवर से बड़ा है |
विक्रम ने बेताल से कहानी पुरी करने को कहा | बेताल ने बताया कि कालदेवता और मौत कुछ भी नहीं था वो तो राजलक्ष्मी का राजा को परखने के लिए रचा मायाजाल था | राजलक्ष्मी ने वीरवर को सेवाभावी और राजा की दयालुता की सराहना की | इसके बाद रूपसेन और राजा दोनों मित्र बन गये और राजा ने उसे अपना सेनापति नियुक्त कर दिया | विक्रम का उत्तर सुनते ही बेताल उड़ जाता है |
तो मित्रो हमारा आपसे ये सवाल है कि अगर आप राजा के सेवक होते तो अपने राजा के लिए अपनी जान दे सकते या नहीं ??? मित्रो इसका जवाब बड़ा कठिन है लेकिन अगर आपको अगर ये कहानी पसंद आयी तो अपने विचार कमेंट में लिखे और शेयर करना ना भूले |
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