एक किला जिसका वारिस आज भी मदद के लिए पुकार रहा है Haunted Shaniwar Wada Palace Story in Hindi
आज मै भारत के उस हिस्से में ले जा रहा हु जिसके बारे में आपने अलग अलग ब्लॉग पर आपने कई बार पढ़ा और सुना होगा लेकिन कही पर भी हिंदी में आपको ये लेख कही नहीं मिलेगा | इसलिए इंडियन घोस्ट स्टोरीज पहली बार इस किले को हिंदी के पन्नो पर ढाल रहा है क्यूंकि वो जगह भारत के दस मशहूर प्रेतबादित स्थानों में से सातवे स्थान पर है | इसके बारे में आपने हर ब्लॉग पर 3-4 लाइन पढी होगी लेकिन हम इसके बारे में आपको इसका पूरा विस्तार से बताएँगे | कौनसी है वो जगह आइये जाने
महाराष्ट्र के पुणे शहर में एक किला है शनिवार वादा महल | Haunted Shaniwar Wada Palace Story in Hindi इस महल को 1746 में मराठा साम्रज्य के पेशवा शाशको ने बनवाया था | इस किले का नाम शनिवार यानि सप्ताह का छठा वार और वडा यानि रहने का स्थान से लिया गया है | इस महल के पांच दरवाज़े है दिल्ली दरवाज़ा ,मस्तानी दरवाज़ा ,खिड़की दरवाज़ा ,गणेश दरवाज़ा और जम्भुल दरवाज़ा |
इस महल के बारे में स्थानीय लोगो का मानना है कि शनिवार वादा का किला पूर्णिमा की रात को सबसे ज्यादा प्रेत बाधित माना जाता है | इसके पीछे एक कहानी है कि उस समय में पेशवाओ को राज था और राजा अक्सर राजगद्दी के लिए किसी को भी मारने में नहीं हिचकते थे |
वहा के स्थानीय नाटको के अनुसार पानीपत के युद्ध के बाद पेशवा बहुत कमजोर पड गये | उनके कई योद्धा उस युद्ध के दौरान मारे गये | नाना साहेब के मौत के बाद उनके पुत्र माधव राव को राजपाट संभलवाया | नाना साहेब के छोटे भाई रघुनाथ राव को उनका काम सँभालने को कहा | लेकिन उनकी नाकामी से पेशवाओ ने उन्हें गृहबंदी बना दिया | माधव राव के मौत के बाद 13 वर्ष के नारायण राव को गद्दी संभलाई और उसी वक़्त नारायण राव को भी रिहा किया गया |
1773 में नन्हे पेशवा को चाचा ने अपने सैनिको से बुलाने को कहा और मराठी में कहा “नारयण राव ला धारा ” मतलब नारायण राव को इधर लाओ लेकिन उसकी लालची पत्नी में राजलोभ में उन दो शब्दों को बदलकर कर “नारायण राव ला मारा ” मतलब नारायण राव को मार दो ये सैनिको तक पंहुचा दिया |जब वो सैनिक उस नारायण राव पेशवा को मारने के लिए पुरे महल में घूम रहे था तब वो राजकुंवर मदद के लिए बड़ी जोर जोर से चिल्ला रहा था
काका , माला वाचवा !
इस मराठी वाक्य का हिन्दी में अर्थ है ” चाचा , मुझे बचाओ ” | लेकिन उसकी आवाज़ किसी तक पहुचने से पहले ही उसका क़त्ल कर दिया गया | स्थानीय निवासियों का मानना है कि आज भी पूर्णिमा की रात को उस बच्चे की मदद की गूंज पुरे महल में फैलती है |
यह किला 1828 में लगी आग में बुरी तरह से जल गया लेकिन बचे हुए ढाँचे को एक पर्यटक स्थल के रूप में बदल दिया गया



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