एक ऐसी प्रथा Toraja Indonesia, जिसमे कब्रों से निकालकर सजाया जाता है शवों को
मरने के बाद दफनाने या दाह संस्कार करना तो सुना था लेकिन क्या आप जानते हैं जिस तरह मिस्र में मृत शरीर को सहेज कर रखे जाने की प्रथा थी वैसी ही एक प्रथा Toraja Indonesia इंडोनेशिया में भी मशहूर है. फर्क है तो बस इतना कि इस प्रथा को मानने वाले लोग कब्रों को खोदकर अपने पूर्वजों की कब्रों को बाहर निकालते हैं और फिर उन्हें अच्छे और महंगे कपड़े पहनाकर तैयार करते हैं.
सुनने में भले ही आपको यह प्रथा बेहद अजीब लगे लेकिन यह बात बिल्कुल सच है कि इंडोनेशिया Toraja Indonesia के दक्षिणी सुलेवासी प्रांत में स्थित तोराजा जिले में एक बेहद हैरान कर देने वाली प्रथा चलन में हैं जिसका नाम है मा-नेने. इस प्रथा के अंतर्गत लोग अपने पूर्वजों की कब्रों को खोदते हैं और उन्हें नए कपड़े पहनाकर तैयार करते हैं. इतना ही नहीं वे अपने परिजन के शव की साफ-सफाई भी करते हैं.
इंडोनेशिया के दक्षिणी सुलेवासी प्रांत के तोराजा जिले में एक अजीबो-गरीब प्रथा चलन में है। मा-नेने नामक इस प्रथा में लोग अपने पूर्वजों की कब्र खोदकर उनके शव को नए कपड़े पहनाकर तैयार करते हैं।
हर तीन साल बाद मनाए जाने वाली मा-नेने Toraja Indonesia प्रथा में लोग अपने पूर्वजों की कब्र खोदकर सड़ चुके शवों को बाहर निकालते हैं और फिर उन्हें नए कपड़े पहनाते हैं। इतना ही नहीं नए कपड़े पहनाकर परिजन इन शवों को पूरे गांव में घमाते हैं।इस प्रथा के बारे में स्थानीय लोगों का मानना है कि ऐसा करने से बरसों पहले मर चुके परिजनों के अभी भी साथ होने का अहसास होता है।
तोराजा Toraja Indonesia एक विषेश आदिवासी जन जाति है जिसके लोग इंदोनेसिया में दक्षिण सुलावेसी द्वीप के मध्य में बने ताना तोराजा पहाड़ों में रहते हैं. दक्षिण सुलावेसी की राजधानी है उजुँग पंडांग जिसका पुराना नाम था मक्कासार और प्राचीन समय से यह शहर समुद्री व्यापार के रास्तों में एक प्रमुख केंद्र था. मुझे तोराजा दो बार जाने का मौका मिला. एक बार वहाँ जा कर, उनको भूलना आसान नहीं है. उजुँग पंडांग पहूँचने के लिए जहाज इंदोनेशिया के सभी प्रमुख शहरों और कुछ करीब के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों से उड़ान मिल सकती है. वहाँ से ताना तोराजा की राजधानी रानतेपाँव तक पहूँचने के लिए करीब दस घँटे की कार यात्रा चाहिये. इस यात्रा का पहला भाग जो समुद्र के किनारे से उत्तर में पारे पारे शहर तक जाता है, बहुत मनोरम है. उसके बाद की पहाड़ों की यात्रा सुंदर तो है पर कठिन भी क्योंकि सड़कें बहुत अच्छी नहीं.
तोराजा Toraja Indonesia की सबसे पहली विषेश चीज़ जो आप को दिखेगी, वह है उनके नाव जैसी छतों वाले लकड़ी के मकान. लगता है किसी ने बड़ी बड़ी नाँवें ऊँचे डंडों पर टका कर, उन पर रंगदार नक्काशी की है. इन भव्य छतों के नीचे छोटे छोटे घर हैं, जिनमें रहना खास आरामदायक नहीं होगा. घरों के बाहर लम्बे डंडों पर जानवरों के सींग और अन्य हिस्से टँगे हुए होते हैं जिनका सम्बंध मृत पूर्वजों से जुड़े रीति रिवाजों से हैं. कहते हैं कि तोराजा तीन हजार साल पहले कहीं और से नाँवों में सुलावेजी में आये थे और यह घर उस यात्रा की यादगार हैं. पर तीन हजार साल तक कोई इतनी मेहनत करे घर बनाने के लिए, वह भी केवल दिखावे के लिये क्योंकि रहने की जगह तो छोटी ही रहती है, कुछ अटपटा सा लगता है.
इन घरों की तुलना भारत में बेटी के दहेज से की जा सकती है, यानि बड़ी छत वाला घर बनवाने से परिवार की इज्जत जुड़ी होती है और तोराजा इनको बनवाने के लिए बड़ा कर्ज तक उठा लेते हैं. तोराजा के समाजिक नियम भी बहुत विषेश हैं, जिसमें विभिन्न रिश्तों के साथ लेने देने के कड़े नियम हैं. किसी की मृत्यु पर इतनी रस्में हैं और खर्चे हैं कि भारत की हिंदु रस्में उनके सामने सरल लगती हैं.
मरने वालों के शरीर पहाड़ों की गुफाओं में रख दिये जाते हैं और गुफा के मुख पर मरने वाले की लकड़ी की मूर्ती रखी जाती है जिसे ताउ ताउ कहते हैं. जहाँ यह कब्रिस्तान वाली गुफाँए हैं, नीचे वादी में खड़े हो कर वहाँ चारों और धुँध में से दिखती ताउ ताउ की मूर्तियाँ देख कर लगता है मानो पर्वत पर लोग खड़े नीचे देख रहे हैं. ताउ ताउ का काम है कि अपने परिवार की और अपने गाँव की रक्षा करें.

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