ग्राहक के रूप में प्रेत से हुआ सामना Encounter Ghost as Customer

Encounter Ghost as Customerमित्रो, मेरा नाम जिग्नेश पटेल है, और मै एक गुजराती परिवार से बिलोंग करता हूँ। मै अहमदाबाद में सेटेलाइट विस्तार में अपने माता -पिता के साथ रहता हूँ। पिताजी पेशे से हलवाई और माँ गृहिणी हैं। पाँच साल पुरानी इस घटना से आज भी में डरा हुआ हूँ। आज मै वह किस्सा आपको बताने जा रहा हूँ, जिसे लिखते वक्त आज भी, उस घटना को याद करने पर मेरा दिल जोरों से धडक जाता है। मेरे रोम रोम में बिजली कौंध जाती है। भूत प्रेत और शैतान में कभी ना मानने वाला पुराना जिग्नेश (में) आज हर एक अंधेरी गली से गुजरने पर काप जाता है। मेरी हालत यह है आज की में रात में भी बत्ती चालू रख कर सोता हूँ।

मेरे पिताजी सख्त स्वभाव के इन्सान थे। बारहवी कक्षा के इम्तिहान में मेरी नाकामी ने मेरे पिताजी के सब्र का बांध तोड़ दिया और उन्होने मुजे मार पीट कर घर से निकाल दिया।में अहमदाबाद से राजकोट शहर भाग आया। जहां एक दोस्त ने रहने का सहारा दिया, पर काम कौन देता एक बारहवी कक्षा फ़ेल स्टूडेंट को? नौकरी ना मिली पर मेंने हिम्मत नहीं हारी और अपने पिता का व्यवसाय, हलवाई और नाश्ता बेचने का काम ही अपना लिया।

राजकोट में गोंडल रोड पर फूटपाथ पर मेंने गाठिया, (गुजराती नाश्ता) पूड़ी सब्जी, का ठेला लगाना शुरू किया। हलवाई काम, और हर तरह का खाना / नाश्ता बनाने का काम मेंने पहले ही पिताजी से सीखा हुआ था। सब कुछ आता था पर पता नहीं क्यू मेरा काम चल ही नहीं रहा था।
दिन भर में एकाद दो ग्राहक ही आते और सारा पका पकाया (नाश्ता / खाना) मुजे फेंक देना पड़ता। गोंडल रोड पर में जहां ठेला लगता था वह एक व्यस्त जगह थी। मेरे सामने खड़े हर एक ठेले पर भीड़ होती पर मेरा काम ही ठप्प था।

मैंने हार मान ली और सब कुछ बेच कर घर वापिस जा कर पिताजी के पैरो में गिड़ गिड़ा के माफी मांगने का फ़ैसला कर लिया। घर वापस जाने के ठीक पिछले दिन दो पहर 12 बजे मेरे डर की कहानी शुरू हुई। में अपने ठैले पर खड़ा था। आस पास ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मै पास की दीवार पर जा कर ही पिशाब करने लगा। में जब उस दीवार पर पिशाब करने लगा तो मुजे एक झटका सा लगा। और ऐसी भयानक आवाज सुनाई दी की मेरे होंश उड़ गए। मुझे ऐसा एहसास हुआ जैसे किसी प्यासे को पानी पी कर संतोष हुआ हो और वह खुश हुआ हो।

थोड़ी देरी हुई तो मेरे आस पास लोग जमा देखे मेंने, और मै जमीन पर गिरा पड़ा था। और मेरे ठेले पर एक ग्राहक खड़ा था। लोगो ने मुझे  उठाया, पानी पिलाया और मै भी उठ कर अपने ठेले पर ग्राहक को समजाने चला गया। वह इन्सान कुछ अजीब था। उसने मुझसे कहा के तुम्हारे हर एक पतीलों में जो जो है वह सब पैक कर दो। सामान बांधने से पहले ही उसने पैसे धर दिये। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह आदमी मेरे ठैले का पूरा खाना / नाश्ता तो ले गया पर पैसे भी ज्यादा दे गया। और उसने छूटे पैसे भी वापिस ना लिए। मेरी हिम्मत बंध गयी। मेंने रुकने का फैसला कर लिया और वह आदमी रोज आ कर मेरा बनाया सारा सामान खरीदने लगा।

एक दिन मै घूमने चला गया। और उस दिन ठैले नहीं निकाला। अलगे दिन में जब ठैला लेकर काम पर पहोंचा तो वह आदमी मेरे सामने आ कर खड़ा हुआ और मुजे अपनी लाल लाल खून भरी आँखों से गुस्से में घूरने लगा। और मुजसे सिर्फ इतना बोला की “मेंने तुम्हें तुम्हारी तकलीफ में सहारा दिया था। और तुमने इसका बदला मुजे कल भूखा रख कर चुकाया… अब में तुम्हें सबक सिखाऊँगा…“  इतना बोल कर वह आदमी उस दीवार के पास पड़े पत्थर की और गया जहां में पिशाब करने गया था, वहीं पर जा कर वह गायब हो गया।

उसकी धमकी और उसका गायब होना देख में पसीने से तरबतर हो गया था। और उसी क्षण अपना ठैला छोड़ कर, राजकोट से बिना टिकट लिए में आहेंदाबाद भाग आया। पिताजी से माफी मांग ली। और अब पिताजी के काम काज में हाथ बढ़ाने लगा हूँ। अब में राजकोट शहर जाना तो दूर उसका नक्शा भी नहीं देखना चाहता हूँ। हर पल यही डर सताता रहता है की वह रहस्य मई प्रेत/इन्सान मुजसे किस प्रकार बदला लेगा।

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