पिशाच के साथ मजाक करना पड़ा भारी Pishacha Story in Hindi

Pishacha Story in Hindi

Pishacha Story in Hindiमित्रो मेरा नाम अखिलेश है और मै हरियाणा का रहने वाला हु | मेरे दोस्त विनेश से मेरी दोस्ती तब हुई थी जब हम बारहवी कक्षा में आए थे। स्वामी नारायण स्कूल में विनेश मेरा पहला दोस्त बना था। मेरे दोस्त विनेश के पिता एक मनमोजी इन्सान है। विनेश के पिता का नाम बावनभाई है। वह भूत प्रेत, चुड़ैल, पीशाच जैसी आसुरी शक्तियों में बिल कुल नहीं मानते हैं लेकिन दो वर्ष पहले पिशाच ने उनकी ऐसी हालत कर दी थी, की वह ना तो खा पाते, नहीं सो पाते। पिशाच के शिकंजे में आने के बाद एक दिन में उन्हे देखने गया था, पर दोस्त के पिता की खबर पूछने जाना मुजे भारी पड़ गया था। उस दिन उन्होनें मुजे बालों से पकड़ कर खींचा, ओर मेरे कानमें जिस तरह वोह चीखें… मेरी तो साँसे अटक गयी थी।

आज मै वह सत्य घटना कहने जा रहा हूँ जो विनेश के पिता बावनभाई के साथ घटी थी |बावनभाई बिजली विभाग में कर्मचारी थे। और बावनभाई भुतिया जगहों को चुन चुन कर वहाँ घूमने जाते और पारलौकिक शक्तियों को ललकारते। विनेश के पिता तांत्रिकों और अघोरियों की मस्ती भी किया करते। बावनभाई की सारी मस्ती उस दिन निकल गयी जब उनका पाला एक खून चूसने वाले सनकी पिशाच से पड़ा।
हुआ ऐसा की दिवाली के अगले दिन पड़ने वाली “काली-चौदशी” के दिन बावनभाई नौकरी पर जा रहे थे। उनहोंने देखा की चौराहे पर किसी ने पानी से गोल घेरा बना कर उसमें नींबू, मावे के पेड़े और लाल कपड़ा रखा हुआ है।

बावनभाई ने सारा कुछ उठा लिया और ऑफिस पर जा कर वह सामाग्री टेबल पर रख दी। और नाश्ता मंगा कर वह नज़र उतारे वाला नींबू तथा पेड़े नाश्ते में खा गए। और लाल कपड़े से मुह साफ कर के उसे गटर में फेंक दिया। “बावनभाई को समज नहीं थी की वह किस मुसीबत में फस चुके हैं। वह चौक पर पड़ा उतारा एक पिशाच उतारा था और उसे एक अघोरी ने चौक में आज़ाद किया था। अब वह प्रेत नींबू और पेड़े के माध्यम से बावन भाई को चपेट में लेने वाला था|

जैसे जैसे दिन चढ़ने लगा बावन भाई का सिर भारी होने लगा। और दोपहर के बारा बजते ही उन्हे खून की उल्टी हुई। सारे ऑफिस कर्मी यह देख कर भौंचके रह गए और तुरंत बावनभाई को अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टर ने उन्हे ग्लूकोस तो लगा दिया पर पिशाच नाम की बीमारी को भला डॉक्टर केसे भगाये?

रात बारा बजे से पिशाच ने त्रांडव शुरू किया। बावनभाई के पेट को कभी फुला देता तो कभी अंदर कर देता। कभी उनके सामने आ कर नाचता तो कभी उन्हें काटने लगता। कभी उसका गला पकड़ता तो कभी उनके कपड़े फाड़ देता। बावन भाई को तुरंत अस्पताल से घर लेजाना पड़ा। जहां उन्हे बांध कर रखना पड़ता था। मेरे दोस्त के पिता की ऐसी हालत देख कर बहुत दुख होता था।

उनकी ऐसी दशा तीन महीने तक रही। इन तीन महीनों में वह एक कैंसर पीड़ित रोगी जीतने कमजोर हो गए। और उन्होने सब से बात करना तक छोड़ दिया था।उनके घर वालों ने बावनभाई को ठीक करने में कोई कसर नहीं छोड़ि। दवा, दुआ, डांट फटकार, प्यार सब आजमाया। पर बावनभाई दिन पर दिन बेकाबू और बीमार ही बनते गए। अंत में डॉक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिये और कहा की इनकी बीमारी हमारी समज से बाहर है।

तभी चमत्कार हुआ। और एक अघोरी / साधू बावनभाई के घर आया। उसने सिर्फ इतना कहा की आप के घर मैं जिसे रहस्यमई तकलीफ है उसे मेरे सामने ले आइये में उसकी तकलीफ ले जाने आया हूँ। मेरे दोस्त विनेश की माँ ने तुरंत अपने पति बावनभाई को वहाँ खड़ा कर दिया। उस साधू / अघोरी ने फिर कहा की, जा कर कुछ पेड़े (मिठाई) और एक नींबू लाल कपड़े में ले आओ।

आंटी ने तुरंत सारी सामग्री ला दी। और उस अघोरी साधू ने वह सब बावन भाई को जूठा करने को कहा। फिर अघोरी वह जूठा पेड़ा और नींबू वहीं खुद खा गया। और लाल कपड़े को अपने गले में बांध लिया। फिर एक पानी लोटा उसने बावनभाई के सिर पे घूमा कर वह पानी खुद पी गया। और वहाँ से चला गया।

अघोरी साधू के जाने के बाद तीन दिन में बावनभाई जैसे थे वैसे बन गए। और अजीब बात यह है की बावनभाई को, यह तक याद नहीं है की खुद की हालत क्या हुई थी। और आज भी वह भूत प्रेत, चुड़ैल, पीशाच में नहीं मानते है, और मन मरजी से पारलौकिक शक्तियों को ललकारते रहते हैं। और मजे से जिंदगी बिता रहे हैं।

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