मनसुख और चम्पा की जोड़ी ने फैलाया, गाँव में आत्माओ का कहर

इन्सान की बुरी आदत उसकी बरबादी का कारण कैसे बनती है| यही बात इस सत्य घटना से पता चलती है| जब इन्सान को मेहनत करने की आदत नहीं रहती है तो वह अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए गलत रास्ते चुनता है| जिस कारण अंत में रूह कपकपा देने वाला अंजाम मिलता है|

बगवदर गुजरात का एक छोटा सा गाँव है| आबोहवा खेती के अनुकूल होने के कारण गाँव खुशहालीभरा जीवन बिता रहा था| बात 1993 की है| मनसुख के बाबूजी दिन रात खेती-बाड़ी कर के घर का खर्चा चला रहे थे| बेटा जवान हुआ तो पिता नें उसे काम-काज में हाथ बटाने को कहा, लेकिन मनसुख सिर्फ मटर-मस्ती करने और जुआ खेलने में मगशुल रहता था| इस लिए माँ बाप नें उसे घर से निकाल दिया|  अब मनसुख चंपा नाम की कुख्यात लड़की के साथ रहने लगा| इन दोनों की दोस्ती का कारण ही जुआ था| दोनों मिल कर गाँव के लोगों को जुआ खिलाने लगे और खुद भी दाव लगाते| करीब 3 महीने में दोनों दिवालिया हो गए, फिर खाने के लाले पड़ गए|

चंपा और मनसुख दोनों जानते थे की, अब उन दोनों की मदद कोई नहीं करेगा| इस लिए उन दोनों नें गाँव के बच्चों को निशाना बनाना शुरू किया| उन्होंने ऐसे ठिकानो का पता किया जहाँ, लोग बेमौत मरे थे| फिर वहां जा कर रात में उन अतृप्त आत्माओं का आह्वाहन शुरू किया| फिर उनमें से दुरात्माओ को छांट कर उनकी बुरी इच्छाएँ पूरी करना शुरू किया| इस काम से चंपा की मैली विद्या में बढ़ोतरी हुई| अब चंपा जब चाहे तब पड़ोस के किसी भी बच्चे को बुखार, खासी, उलटी सरदर्द जैसे छोटे बड़े रोग लगा देती| इस काम के लिए वह बच्चों को घर पर बुलाती और उसके कपडे का टुकड़ा और बाल कांट लेती| फिर रात में शमसान जा कर उपद्रवी आत्माओं के लिए उन चीजों से अनुष्ठान करती| ताज़ा खून, जानवर का मांस वगेरा चढाने के लिए मनसुख मदद करता|

बच्चों को बीमार करा के, खुद उनका इलाज मेली विद्या हटा कर कर देना, इस जोड़े नें अपना पेशा बना लिया| देखते देखते दोनों खूब पैसा कमाने लगे| बार बार बच्चे बीमार पड़ते, बार बार इलाज होता| इस बात से गाँव वालों को, चंपा और मनसुख पर ही शंका हुई| अब गाँव के लोगों नें इन पर नज़र रखना शुरू किया| एक रात गाँव का दरज़ी रमेश खासी के कारन अचानक जाग गया| उसकी नज़र खिड़की के बहार पड़ी तो उसके होंश उड़ गए| मनसुख एक मरी हुई बिल्ली को पूंछ से पकड़ कर चंपा के पीछे समशान की और जा रहा था| रमेश चप्पल पहन कर फ़ौरन उन दोनों के पीछे चल दिया|

उस ने छुप कर देखा तो वह शर्म से पानी पानी हो गया| समशान में अंदर जाते ही चंपा अपने वस्त्र उतार कर बाल बिखेर कर नाचने लगी| मनसुख वहां मरी बिल्ली काट कर उसका खून उसके चारो और बिखेरने लगा| यह सब देख कर रमेश की रूह काँप गयी| उसकी ज़बान जैसे हलक से निचे ही उतर गयी| वह चिल्लाना चाहता था लेकिन, एक शब्द बोल नहीं पा रहा था| फिर अचानक उसने देखा की, वहां चंपा धुल पर कुछ लिखने लगी| रमेश काफी डरा हुआ था| फिर भी कांपते हुए वह झाडी के पीछे से और करीब गया| ताकि देख सके की वह क्या लिख रही है|

ज़मीन पर लिखे नाम पढ़ कर रमेश का खून खौल गया| उसने देखा की वहां गाँव के ही कुछ बच्चों के नाम लिखे थे| जिसमें उसके खुद के बेटे का भी नाम था जो बार बार बीमार पड़ रहा था और चंपा उसका इलाज कर के पैसे ऐठती थी| अब रमेश जोश से भर गया| वह उलटे पाँव दौड़ कर गाँव के लोगों को वहां ले आया| मनसुख के बूढ़े माँ-बाप भी आये| उन्होंने अब मनसुख को मरा हुआ मान कर रिश्ता तोड़ लिया| वह दोनों शर्मिंदा हो कर वहां से चले गए|

गाँव के लोगों नें इन दोनों (मनसुख और चंपा) को खूब पीटा| और उनका हुक्का पानी बंद कर के, गाँव की हद के बहार फेंक दिया| दोनों टीले के पार झोपडी में रहने लगे| वहां झोपडी पर दिन तो कट जाता लेकिन, रात में वह बुरी आत्माएं भोग खाने आती| चंपा उसे कुछ दे नहीं पाती तो वह उसके शरीर को ही काटते नोचते रहते| एक रात किसी झगडे के कारण मनसुख वहां से चला गया| इस घटना के बाद तीसरे ही दिन उसकी लाश एक वीरान जगह पर मिली| मौत का कारन आज तक कोई बता नहीं सका| लोग कहते हैं की चंपा नें ही रोष में आ कर मनसुख का भोग लिया| ताकि बुरी आत्माएं उसे तंग ना करे|

करीब छे महीने बीत गए| चंपा उस झोपडी में अकेली ही रहती थी| देर रात को अक्सर उसके चिल्लाने और कराहने की आवाजें गाँव में सुनाये देती, लेकिन उसकी बुरी करतूतों के कारण कोई उसकी मदद को नहीं जाता| फिर अचानक एक दिन उस झोपडी से गंदी बदबू आने लगी| गाँव के लोगों नें जा कर देखा तो पता चला की, चंपा मरी पड़ी थी| उसका शरीर कटा फटा था और उसकी आँखों की पुतलियाँ गायब थी| लोगों नें उसका अंतिम संस्कार वहीँ झोपडी समेत कर दिया| कोई उसे हाथ लगाने की हिम्मत नहीं करना चाहते थे|

अब टीले के पार वहां राख के सिवा कुछ नहीं रहा था| फिर भी रातों में वहां से कई बार चिल्लाने और कराहने की आवाजें आती है| गाँव में बच्चे अब भी बीमार पड़ जाते हैं, लेकिन अब गाँव के लोग किसी ओझा, हकीम के पास नहीं जाते, सीधे डॉक्टर के पास जा कर इलाज करने में विशवास रखते है| इस घटना से हमें एक सिख मिलती है की, बुराई का अंजाम बुरा ही होता है| और सांप एक दिन उन्हें ही डस लेता है जो उन्हें दूध पिलाते हैं, पालते हैं|

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